मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

ओ रोमांचक @15days

ओ रोमांचक @15days 

डे-1 (11-12 अगस्त, 2018)



















सफर की शुरुआत हुई भोपाल से। राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली के लिए मैं, ललित और चंदू दादा साथ निकले। तैयारियों पर चर्चा करते और रोमांचक सफर का ऐहसास लिए दिल्ली कूच। अल सुबह दिल्ली पहुंचे। निजामद्दीन स्टेशन उतरे और चाय पी कर इंदिरा गांधी हवाई अड्डा निकल गए। लगभग 40 मिनट बाद हम हवाई अड्डे पर थे। मेरा और ललित का पहला हवाई सफर होने जा रहा था। बेहद उत्साहित हम लोगों ने चेक इन किया। वेटिंग हॉल में कुछ समय निकाला। तब तक भाई विशाल मुंबई से लैंड कर चुका था। चारों ने एयरपोर्ट पर नाश्ता किया और 11:00 बजे की इंडिगो की फ्लाइट पकड़ी। हमने विंडो सीट बुक की हुई थी। सबकुछ साफ दिख रहा था। प्लेन ने उड़ान भरी। कुछ ही देर में हम धरती से लगभग 9 किमी ऊपर थे। हमारे नीचे बादल ऐसे दिख रहे थे जैसे किसी ने रूई के लच्छे हवा में उड़ा दिए हो। शहर बेहद ही छोटे। जम्मू में लैंडिंग हुई तो जोरदार झटके के साथ बैलगाड़ी का भी ऐहसास हुआ। फिर श्रीनगर के लिए निकले। जम्मू से श्रीनगर के बीच हिमालय की पहाड़ियों को आप देख सकते हैं। 1:30 बजे हम श्रीनगर में थे।
हमारी होटल सदफ शहर के लाल चौक के पास ही थी। होटल के गेट पर ही सेब का पेड़ हमें आकर्षित कर रहा था। फ्रेश होकर हम लोग शहर घुमने निकल गए। सबसे पहले हम डल झील पहुंचे। वहां शिकारा राइड की। शहर के बीचोबीच बसी इस झील में पूरा शहर है। लोग रहते है और सब्जी से लेकर सभी चीजें आपको यहां उपलब्ध है। डल झील में ही एक छोटा सा गार्डन है। नौकायन की भी सुविधा है। हालांकि, इस झील को शहर ने चारो ओर से घेर रखा है, लिहाजा गंदगी भी इसमें ही समाहित होती है। इसकी सफाई का काम भी अनवरत चलते रहता है। लोग कहते हैं कि यहां बर्फ जम जाती है और लोग क्रिकेट खेलते हैं। जानकारों के अनुसार, ऐसा सिर्फ 1988 में ही हुआ था। अभी कुछ ही क्षेत्र में बर्फ जमती है। झील के बीच में ही लाइन से हाउस बोट बने हुए हैं। इन्हीं में है, क्राउन आॅफ इंडिया हाउस बोट। इसी में अगले दिन हमें रूकना था। आनंद आ गया नजारा देखकर। यहां से हम चश्मेशाही गार्डन देखने निकल गए। भूख भी जोरो से लग रही थी। एक होटल में नाश्ता किया। चश्मेशाही गार्डन पहाड़ों के बीच बसा हुआ है। काफी सुंदर। तीन तरफ पहाड़ और चौथी तरफ डल झील के साथ शहर का मनोरम दृश्य। यहां काफी देर हमने फोटोग्राफी की। लौटकर होटल आए तो दिन ढल चुका था। डिनर करके हम सो गए। चूंकि अगले दिन हमारी ट्रेनिंग थी और हम राइड आॅफ माय लाइफ से जुड़ने वाले थे।

मुस्कराइये आप रोमांचक सफर पर है...
क्रमश:...

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सोमवार, 10 दिसंबर 2018

ओ रोमांचक @15days


अचरज नहीं करना। शीर्षक @15 days कुल समयावधि है। इसमें से 10 दिन हमारी जिंदगी के सबसे खूबसूरत और रोमांचक दिन रहे। वे अविस्मरणीय है।
मैं अक्सर एक रोमांचक दौर से गुजरने के बारे में सोचता था। फिर, दोस्त वैभव गुप्ता, पीयूष मिश्रा, जीजा के साथ लगभग दो साल पहले प्लान बनाया। बाइक से लद्दाख होकर आते हैं। जुलाई में जाने का प्लान था। फिर मई में मुझे कमर में चोट लगी और एक दोस्त का ऑपरेशन हो गया। सारा प्लान धरा रह गया। इस प्लान को लेकर मेरे चचेरे भाई विशाल जैन से बात हुई थी। उन्होंने मुझे कुछ लिंक भेजकर वहां के बारे में बताया था। फिर डेढ़ साल बीत गया। इस बीच बड़े भाई चंद्रकांत जैन उर्फ चंदू दादा से भी इस बारे में बात होती रही। हम तीनों ही इस पर बात करते रहे। विशाल भाई बहुत बढिय़ा प्लानर है। 26 जनवरी को मैं और दादा मुंबई पहुंचे विशाल भैया के यहां। वहीं बैठकर पूरे प्लान को मूर्त रूप देने का निर्णय किया। विशाल भाई तब तक काफी तैयारी कर चुके थे। कुछ विडियो और राइड कराने वाली कंपनियों के बारे में पूरी जानकारी निकाल चुके थे। हमें सभी कुछ दिखाया। एक ऐसा विडियो भी दिखाया, जिसमें एक पति-पत्नी अकेले निकले थे और काफी परेशान हुए थे। तब हमने फाइनल किया कि जाएंगे तो किसी कंपनी के माध्यम से। राइड ऑफ माय लाइफ को हमने चुना। उनका टूर अगस्त में था। हमारे पास तैयारी के लिए लगभग 5-6 माह थे। दो दिन बाद ही हम लौट आए।
फिर चर्चाएं होती रही। मेरा जाना इसमें 90 फीसदी न के बराबर था। मेरे सामने सबसे ज्यादा परेशानी पैसों की थी। इस अद्भुत ऐहसास को महसूस करने के लिए कम से कम 75 हजार रुपए चाहिए थे। जो मुझे जानते हैं उन्हें पता है पिछले चार साल की लड़ाई के कारण ऐसा कदम उठाना खतरे से खाली नहीं था। फिर चंदू दादा ने बोला तू चिंता मत कर। लेकिन, प्लान कैंसिल नहीं होना चाहिए। उनके शब्दों ने हौसला बढ़ा दिया। वक्त के साथ ही रजिस्ट्रेशन भी हो गया। फिर एक दिन मित्र ललित कटारिया से बातचीत हुई। उसने भी साथ चलने की इच्छा जता दी। मैंने उसे पूरी जानकारी दी और तैयारी करने का बोला। जुलाई तक सारी औपचारिकताएं पूरी करके हम तैयार थे।
इस दौरान हमने पूरे टूर के कई विडियो देखे। कई कहानियां पढ़ी। कई जोखिम वाले रास्तों के बारे में सुना। फिर भी मन में एक ही राग था, चलना है। जो होगा देखा जाएगा। मैंने आखिरी तक मेरे बेटे के अलावा घर के किसी सदस्य को नहीं बताया कि मैं कहां जा रहा हूं। इन खतरनाक रास्तों के बारे में बताता तो शायद पिताजी मुझे अनुमति नहीं देते। फिर 11 अगस्त को ओ दिन आ गया, जब एक सपना साकार करने हम निकल पड़े।

मुस्कराइये आप रोमांचक सफर पर है...
क्रमश:...

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मंगलवार, 24 मई 2011

सैयद मेहबूब अली हॉकी की दीवानगी अभी बाकी


65वें औबेदुल्ला गोल्ड कप का दूसरा दिन। हॉकी की नर्सरी में पहले दिन की अपेक्षा दर्शकों की कमी। वहीं मुख्य पैवेलियन के पास कुर्सी पर बैठकर मैच को तल्लीनता से देख रहे पूर्व लेफ्ट इन सैयद मेहबूब अली। नर्सरी का एक ऐसा नाम जो लंबे समय तक हॉकी से जुड़ा रहा। खपौटों से शुरू हुई हॉकी और फिर अनवरत ही चलती रही। उम्र के 73वें पड़ाव में भी हॉकी की दीवानगी बरकरार। चर्चा करने पर पता चला कि आजादी के पहले से हॉकी खेलना शुरू किया। कई बार औबेदुल्ला खां गोल्ड कप में भी भागीदार रहे। मेहबूब साहब कहते हैं, हमारे जमाने में हॉकी तो हुआ करती थी, लेकिन इतनी सुविधाएं नहीं थी। आज क्या नहीं है, लेकिन हॉकी भी महंगी हो गई है। पहले खपौटों से खेली। फिर 12 रुपए में हॉकी मिली। पांच रुपए की वह गेंद आज भी याद आती है। सरकार और इस खेल के रखवालों को चाहिए कि हॉकी का सामान सस्ता करें। तब तो गरीब खिलाड़ी भी मैदान में उतर पाएगा। मेहबूब ने कहा कि एक समय था, जब हमने दुनिया को हॉकी सिखाई। अजलन शाह का प्रदर्शन देखकर लगता है कि हमें दूसरों से सीखने की जरुरत है। आॅस्ट्रेलिया ने पाकिस्तान को पीटा और फिर पाक ने हमें हराया। न्यूजीलैंड जैसी टीम से हम 7-2 से हारे। देखकर ही दिल बैठ जाता है। सच कहूं तो भोपाल ही नहीं देश में भी टूर्नामेंट और मैदानों की कमी हो गई है। 1964 में भारतीय टीम के कैंप में रहे, लेकिन कारणवश चयन नहीं हुआ। मेरे कुछ साथी पाकिस्तान चले गए जो 1948 में भारत से और 1952 में पाकिस्तान से खेले। मुझे भी कहा गया, लेकिन मुझे मेरा मुल्क पसंद था, भारत। मैंने जो कुछ सीखा और पाया अपने देश से ही। मैं आज भी उतना ही खुश हूं, लेकिन हॉकी का गिरता स्तर विचलित कर देता है। नए खिलाड़ियों से मेरी गुजारिश है कि वे गलत चीजों को न अपनाएं और खेल पर ध्यान दें।

बुधवार, 12 जनवरी 2011

श्रद्धांजलि





हॉकी की नर्सरी का एक और फूल मुरझा गया। अपने ताकतवर शॉट और कलात्मक हॉकी के लिए मशहूर नूरुद्दीन का रविवार रात को 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे भोपाल हॉकी के जेंटिल कहे जाते थे।
अतीत के गलियारे में देखे तो हॉकी की बगिया में उस समय सिर्फ यही खेल गली-कूचों में खेला जाता था। छह वर्ष की उम्र में ही नूरुद्दीन साहब ने हॉकी को थाम लिया और सिकंदरिया मैदान पर इसका ककहरा सीखा। 1947 में क्लब हॉकी से जुड़े और निरंतर खेलते रहे। उन्हें भोपाल हॉकी का जेंटिल क्यों कहा जाता है, इसके पीछे भी एक रोचक वाकया था। अपने समय में टाटा की टीम में आरएस जेंटिल हुआ करते थे। उनका नाम था रणधीर सिंह। वे हॉकी के बेहतरीन खिलाड़ियों में शुमार हुआ करते थे। कहा जाता था कि उनकी स्टिक पर गेंद आ जाए तो फिर गोल निश्चित है। एक बार भोपाल खेलने आई टाटा की टीम की ओर से खेलते हुए वे गोल नहीं कर पाए। भोपाल की टीम से खेल रहे नूरुद्दीन साहब ने गोल दागा और अपने खेल से सभी को प्रभावित किया। नूरुद्दीन साहब के खेल से आरएस जेंटिल इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनके पास आकर कहा कि असली जेंटिल तो आप है। बस तभी से नूरुद्दीन साहब का नाम ‘भोपाल हॉकी का जेंटिल’ पड़ गया।
यही नहीं नूरुद्दीन साहब की चार पीढ़ियां हॉकी से जुड़ी रही। उनके नाती भी हॉकी खेल रहे हैं। नूरुद्दीन के बेटे एजाजुद्दीन ने भी हॉकी खेली और उनके दो बेटे नजमुद्दीन और एफाजुद्दीन भी हॉकी खेले।
नूरुद्दीन साहब कहा करते थे कि हमारे जमाने में हॉकी बड़ा साफ-सुथरा खेल हुआ करता था। तब दर्शक संजीदा कमेंट्स किया करते थे, जिससे खिलाड़ी बेहतर करने के लिए प्रेरित हुआ करता था। आज सब कुछ बदल गया है। हमारी कलात्मक हॉकी को विदेशियों ने पॉवर गेम बना दिया।
भोपाल हॉकी का यह वटवृक्ष तो अब मुरझा गया है, लेकिन उनकी यादें और उनका ‘जेंटिल’ होने का रुतबा हमेशा याद किया जाएगा।

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

आओ सुशील गुरु हो जाओ शुरू...

गुरुवार (छह जनवरी) शाम का सूरज ढलने को है। तात्या टोपे राज्य खेल परिसर के मार्शल आर्ट्स भवन में खिलाड़ियों का हुजूम अपने सितारे का इंतजार कर रहा है। कुछ ही देर में भारत का यह सितारा सभी के सामने था। विश्व चैंपियन पहलवान सुशील कुमार। अब गुरु सुशील।
चूंकि मप्र राज्य कुश्ती अकादमी के कोच और तकनीकी सलाहकार भी बने है। सुशील ने अपनी नई भूमिका का आगाज भी दमदार तरीके से किया। छोटे से सम्मान समारोह के बाद ही सुशील ने मंच से ही दांव पेंच सिखाने का शंखनाद कर दिया। माइक पर उसी हरियाणवी टोन में बोले ‘तैयार हो जाओ’। सुशील भी उतरे और बमुश्किल पांच मिनट में पहलवानों वाली किट में रिंग पर नजर आए। अकादमी के पुरुष और महिला पहलवानों के बीच रिंग पर सुशील थे। गुरु का काम शुरू हो गया। बोले, चलो थोड़ा वार्मअप हो जाए। वार्म अप बड़ा गजब का था। देखने वाले सुशील की चीते सी फूर्ति देखकर अचंभित थे। ऐसे ही सुशील विश्व चैंपियन नहीं है। वह जानते हैं सेकेंड के सौंवें हिस्से में पदक फिसल सकता है। दो मिनट बाद सुशील ने पहला दांव बताया। ऐसे कमर में हाथ डालो और यूं टंगड़ी अंटी लगाकर चित कर दो। सुशील ने कहा, समझ आया, जिसे समझ नहीं आया फिर पूछ लो...।  फिर बताया और पांच-पांच बार अभ्यास के लिए सभी को भिड़ा दिया। सुशील कोई आराम नहीं कर रहे थे, अपने साथी के साथ तकनीक पर पकड़ बना रहे थे। गुरु सुशील के प्रशिक्षण का सिलसिला चलते ही रहा। फिर विरोधी को चारो खाने चित करने की नई तकनीक बताई। सुशील बोले, देखा...। किस-किस की समझ आया? हाथ खड़े करो। कुछ ने किए, कुछ समझ नहीं पाए। गुरु ने पुकारा, आओ फिर समझाता हूं। दोबारा दांव को समझाया। अब फिर पांच-पांच बार अभ्यास में जुट गए पहलवान। खिलाड़ियों के चेहरे पर इस प्रशिक्षण का ओज स्पष्ट देखा जा सकता था। बड़े खुश थे कि विश्व चैंपियन से दांव सीखने को मिल रहे हैं।
सुशील ने एक पहलवान को बुलाया। तुम करोगे। जी...। फिर उसकी ढीली डेÑस देखकर बोले ये ढीली क्यों है? उसने कहा दूसरे की पहनी है। गुरुजी बोले कोई बात नहीं, फिट होना चाहिए। फिर उसे एक खिलाड़ी के साथ भिड़ाकर  बताया अगला दांव। लगभग 45 मिनट के इस प्रशिक्षण से सुशील कुमार तरोताजा हुए, वहीं अकादमी के युवा पहलवानों के चेहरे पर किसी चैंपियन से कम चमक नहीं थी।     

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

Hero of Bhopal

हिमालय और अमरदीप ने जगाई
पदक की उम्मीद


कहते है यदि हौसले बुलंद हो तो फिर लंगड़े भी पहाड़ लांघ जाते हैं। इन्हीं फौलादी इरादों के साथ तलवारबाजी में आज से लगभग 10 वर्ष पहले कदम रखने वाले राजधानी भोपाल की झुग्गी बस्तियों से आने वाले अमरदीप और हिमालय ने इसे सच कर दिखाया है। स्लम के ये सितारे भारतीय तलवारबाजी का भविष्य बनकर उभरे है। पिछली कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुके और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके इन दोनों खिलाड़ियों ने पहली बार कॉमनवेल्थ फेंसिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीतकर भविष्य में पदकों की उम्मीद जगा दी है।

                                   हिमालय विश्वकर्मा और अमरदीप बसेड़िया


किसी भी खिलाड़ी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने से बड़ा कोई और लम्हा नहीं हो सकता। पिछले 10 वर्षों की तपस्या के बाद राजधानी भोपाल के दो होनहार खिलाड़ियों ने इस सपने को साकार कर दिखाया। ये दोनों खिलाड़ी हैं अमरदीप बसेड़िया और हिमालय विश्वकर्मा। इन दोनों ही खिलाड़ियों ने हाल ही में मेलबोर्न में संपन्न कॉमनवेल्थ फेंसिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीतकर भविष्य की उम्मीदों का आगाज कर दिया है। भारत को कॉमनवेल्थ फेंसिंग चैंपियनशिप में पहली बार कोई पदक हासिल हुआ है।
इन दोनों ही खिलाड़ियों ने बचपन से एक साथ पढ़ाई की और खेलों के क्षेत्र में भी साथ-साथ कदम रखा। बिड़ला मंदिर के सामने की बस्ती में रहने वाले अमरदीप ने वर्ष 2000 से फेंसिंग का प्रशिक्षण लेना शुरू किया। यही नहीं कुछ ही वर्षों में वे अपने साथ हिमालय को भी ले गए। इन दोनों खिलाड़ियों ने अपने मोहल्ले के अन्य बच्चों को भी इस खेल में आकर्षित किया। अब वहां से लगभग 10 बच्चें फेंसिंग सीखने स्टेडियम आते हैं। इन दोनों खिलाड़ियों ने अपने खेल के प्रति गंभीरता दिखाई और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।

मुफलिसी में बिताए दिन
एक समय था जब इन दोनों खिलाड़ियों ने बेहद तंगी से निकलते हुए अपने खेल में सफलता अर्जित की। अमरदीप पहले एथलीट बनना चाहते थे, लेकिन एक दिन अभ्यास में ही उनका एक हाथ फे्रक्चर हो गया। इसके बाद उन्होंने तलवारबाजी को अपना लिया। अमरदीप के पिता चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी है, जबकि हिमालय अपने पिता के साथ उनके रोजमर्रा के काम में हाथ बंटाया करते थे। इन सबके बावजूद इन खिलाड़ियों ने कभी हिम्मत नहीं हारी और सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले गए।
अकादमी की सुविधाएं
कुछ वर्षों पहले खेल विभाग के पास भी तलवारबाजी के उपकरण नहीं थे। इससे खिलाड़ियों को भी प्रशिक्षण में दिक्कत होती थी। प्रदेश सरकार ने खेल विभाग का बजट बढ़ाया और नई योजनाओं के तहत मार्शल आर्ट्स अकादमी की स्थापना हुई। इस अकादमी के माध्यम से इन खिलाड़ियों को बेहतर उपकरण और उच्च स्तरीय प्रशिक्षण मिलने लगा। कॉमनवेल्थ फेंसिंग चैंपियनशिप के चयन ट्रायल में हिमालय और अमरदीप में सर्विसेज के खिलाड़ियों को हराया था। सर्विसेज के खिलाड़ियों को विदेशी कोच द्वारा प्रशिक्षित किया जा रहा था।

गुरू भी कम नहीं

                                                  भूपेंद्र सिंह चौहान


इन दोनों ही खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण देने वाले भूपेंद्र सिंह चौहान अपने समय के धुरंधर खिलाड़ी रहे है। उन्होंने विश्व चैंपियनशिप और एशियन चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा दो दर्जन से अधिक राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। 1993 से खिलाड़ी के रूप में सफर शुरू करने वाले भूपेंद्र को राज्य शासन के सर्वोच्च ख्ोल पुरस्कार 2001 में एकलव्य और 2003 में विक्रम पुरस्कार दिया गया। लगभग एक दशक तक खिलाड़ी के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले भूपेंद्र ने 2004 में पटियाला से एनआईएस में डिप्लोमा किया। एनआईएस के आधार पर उन्हें स्टेडियम में ही खिलाड़ियों के प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी मिल गई। भूपेंद्र के प्रशिक्षण में अनुशासन और परिणाम के लिए सच्ची लगन होना शुमार है। इसके लिए वह खिलाड़ियों में प्रतिस्पर्धा पर हमेशा जोर देते आए हैं। भूपेंद्र भारतीय फेंसिंग महासंघ की ओर से पेरिस में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फेंसिंग डिप्लोमा के लिए चुने गए। 2007 में उन्होंने यह डिप्लोमा पूर्ण कर खिलाड़ियों को और भी बेहतर तरीके से तराशा। पिछले छह वर्षों में भूपेंद्र ने आठ अंतरराष्ट्रीय और लगभग 30 राष्ट्रीय खिलाड़ी इस विधा में भारत को दिए हैं। यही कारण है कि प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षक का विश्वामित्र अवार्ड उन्हें वर्ष 2009-2010 के लिए दिया गया।


अमरदीप की उपलब्धियां
2005    जूनियर वर्ल्ड कप, आॅस्ट्रेलिया    भागीदारी
2006    एशियन जूनियर चैंपियनशिप, कुवैत    भागीदारी
2006    जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप, कोरिया    भागीदारी
2009    जूनियर एशियन फेंसिंग चैंपियनशिप, सिंगापुर    भागीदारी
2009    जूनियर कॉमनवेल्थ फेंसिंग चैंपियनशिप, मलेशिया    भागीदारी
2010    सीनियर कॉमनवेल्थ फेंंसिंग चैंपियनशिप, मेलबोर्न    रजत
(इसके अलावा राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में दो स्वर्ण, छह रजत और पांच कांस्य जीते हैं)

हिमालय की उपलब्धियां
2006    जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप, चेन्नई    भागीदारी
2009    एशियन फेंसिंग चैंपियनशिप, दोहा    भागीदारी
2010    सीनियर कॉमनवेल्थ फेंंसिंग चैंपियनशिप, मेलबोर्न    रजत
(इसके अलावा राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में एक स्वर्ण और दो रजत पदक जीते हैं)